Cricket Clash: India vs. England – The Epic Showdown!

people in het himachal pradesh cricket association stadium in india

Cricket, often referred to as the gentleman’s game, has taken the world by storm with its gripping matches and passionate fan base. While it is loved and played in many countries, few matchups generate as much excitement and frenzy as an India vs. England cricket clash. These two cricketing giants have a storied history of fierce competition, and whenever they meet on the field, it’s nothing short of an epic showdown.

In this long-form article, we will delve into the world of cricket, exploring the rivalry between India and England, their historic clashes, star players, and the impact of these matchups on the cricketing world.

boys playing cricket
Photo by Patrick Case on Pexels.com

The History of the Rivalry

The rivalry between India and England in cricket dates back to the colonial era. Cricket was introduced to India by the British, and it didn’t take long for the sport to gain popularity. In the early 1930s, India played its first-ever Test match against England, marking the beginning of a competitive rivalry that would last for decades.

Iconic Encounters

Over the years, India and England have been involved in some iconic encounters that have left an indelible mark on the cricketing world. One such match was the 1971 Oval Test, where India clinched its first-ever Test series win on English soil. The image of captain Ajit Wadekar and his team holding the trophy aloft is etched in cricketing history.

Modern-Day Duels

Fast forward to the modern era, and the battles between these two cricketing powerhouses have only intensified. The introduction of shorter formats like One-Day Internationals (ODIs) and Twenty20 (T20) matches has added a new dimension to the rivalry. Fans now eagerly await limited-over clashes between India and England with bated breath.

Star Players

A key component of these epic showdowns is the presence of star players. India has seen legends like Sachin Tendulkar, Rahul Dravid, and Virat Kohli grace the field. England, on the other hand, boasts iconic cricketers such as Alastair Cook, Kevin Pietersen, and Joe Root. The clash of these cricketing titans adds a layer of excitement to every match.

monochrome photo of athletes on field
Photo by kabita Darlami on Pexels.com

Impact on the Cricketing World

The India vs. England rivalry doesn’t just captivate fans; it also has a significant impact on the cricketing world. These matches draw massive television audiences, making them a commercial success. They also inspire budding cricketers in both countries to dream of representing their nation on the grand stage.

The Build-Up and Hype

As the date of an India vs. England match approaches, the excitement and anticipation reach a fever pitch. Media coverage, expert analyses, and fan discussions dominate the cricketing landscape. The build-up to these matches is often as enthralling as the games themselves.

A Global Spectacle

What makes this rivalry even more remarkable is its global reach. Cricket enthusiasts from all corners of the world tune in to witness the battle between these giants. It’s a testament to the universal appeal of the sport and the charisma of these two cricketing nations.

people in het himachal pradesh cricket association stadium in india
Photo by Aalekh Deval on Pexels.com

The Future of the Showdown

As we look to the future, the India vs. England cricket rivalry shows no signs of slowing down. With talented youngsters emerging on both sides, the battles are set to continue for years to come. The only certainty is that each encounter will be a spectacle to behold.

Conclusion

In the world of cricket, the clashes between India and England stand out as epic showdowns that encapsulate the spirit of the sport. The history, the players, the anticipation, and the impact make these matches a must-watch for cricket enthusiasts worldwide. As the rivalry continues to evolve, one thing is for sure: the epic showdown between India and England will remain a cornerstone of cricketing excellence for generations to come.

“आहार के मौसमिक परिवर्तन: गर्मी और बरसात के मौसमों में सही खान-पान के फायदे”

गर्मी के दिनों में पित्त धड़कता है, इसीलिए ऐसा खाना चाहिए जो जल्दी हजम हो सके। बारिश के दिनों में पित्त सम रहता है। इसलिए बरसात के महीना में भोजन हल्का होना चाहिए। इस समय शरीर में पानी बहुत होता है। हरी पत्तियों की सब्जियों में पानी अधिक होता है। शरीर के लिए ज्यादा पानी भी अच्छा नहीं है और कम पानी भी अच्छा नहीं है।

आहार के मौसमिक परिवर्तन

गर्मी के दिनों में पित्त धड़कता है, इसीलिए ऐसा खाना चाहिए जो जल्दी हजम हो सके। बारिश के दिनों में पित्त सम रहता है। इसलिए बरसात के महीना में भोजन हल्का होना चाहिए। इस समय शरीर में पानी बहुत होता है। हरी पत्तियों की सब्जियों में पानी अधिक होता है। शरीर के लिए ज्यादा पानी भी अच्छा नहीं है और कम पानी भी अच्छा नहीं है।

1.अजवाइन पित्तनाशक है

— अजवाइन पित्तनाशक है। देसी गाय के घी के बाद पित्त को संतुलित करने में अजवाइन का स्थान है। पित्त की बीमारियां जैसे एसिडिटी, हाइपर एसिडिटी, अल्सर, मुंह में पानी आना, खाने का हजम न होना, खाना खाने के 2 से 3 घंटे बाद भी खाने का स्वाद मुंह में रहना, डकारें आना, हिचकी आना आदि।

धनिया, जीरा, अजवाइन खाने से पेट की गैस खत्म हो जाएगी, ऐसा हमारी माताएं सर्दियों में हमें बताती रही है।

   --- गैस की समस्या होने पर खाने में अजवाइन को मिलना शुरू कर दे या खाना खाने के बाद थोड़ी अजवाइन तवे पर सेंक कर थोड़ा काला नमक मिलाकर जरूर खाएं, तीन दिन के अंदर गैस की समस्या से समाधान मिल जाएगा।
Closeup of coriander seed

2.धनिया, जीरा, अजवाइन

— धनिया, जीरा, अजवाइन खाने से पेट की गैस खत्म हो जाएगी, ऐसा हमारी माताएं सर्दियों में हमें बताती रही है।

— गैस की समस्या होने पर खाने में अजवाइन को मिलना शुरू कर दे या खाना खाने के बाद थोड़ी अजवाइन तवे पर सेंक कर थोड़ा काला नमक मिलाकर जरूर खाएं, तीन दिन के अंदर गैस की समस्या से समाधान मिल जाएगा।

— पित्त को सम रखने के लिए अजवाइन के बाद कोई चीज यदि है तो वह है जीरा। काला जीरा, सफेद जीरा से अच्छा होता है। जीरे के बाद रिंग का नंबर आता है। इसे भी भगवान ने ही बनाया है। हींग के पहाड़ होते हैं।

— इसके बाद धनिया का नंबर आता है। जब तक हरा धनिया है जब हरा धनिया खाइए। इसके बाद सूखा धनिया खाइए। दोनों के गुण बराबर होते हैं। पित्त को सम करने के लिए रसोई में कुल 108 चीज हैं।

3.पित्त को नियंत्रित करने के लिए काला जीरा अच्छा होता है।

— पित्त को नियंत्रित करने के लिए सबसे अच्छा देसी गाय का घी है। भैंस का घी कुश्ती लड़ने वाले पहलवानों के लिए सबसे अच्छा होता है। इन्हें गाय का घी नहीं खाना चाहिए अन्यथा ये लोग बीमार पड़ सकते हैं। घी बरसात और गर्मी के समय में अधिक खाना चाहिए।

गर्मी के दिनों में पित्त धड़कता है, इसीलिए ऐसा खाना चाहिए जो जल्दी हजम हो सके। बारिश के दिनों में पित्त सम रहता है। इसलिए बरसात के महीना में भोजन हल्का होना चाहिए। इस समय शरीर में पानी बहुत होता है। हरी पत्तियों की सब्जियों में पानी अधिक होता है। शरीर के लिए ज्यादा पानी भी अच्छा नहीं है और कम पानी भी अच्छा नहीं है।

4.पित्त को संतुलित करने में अजवाइन का स्थान है।

— अजवाइन पित्तनाशक है। देसी गाय के घी के बाद पित्त को संतुलित करने में अजवाइन का स्थान है। पित्त की बीमारियां जैसे एसिडिटी, हाइपर एसिडिटी, अल्सर, मुंह में पानी आना, खाने का हजम न होना, खाना खाने के 2 से 3 घंटे बाद भी खाने का स्वाद मुंह में रहना, डकारें आना, हिचकी आना आदि।

— धनिया, जीरा, अजवाइन खाने से पेट की गैस खत्म हो जाएगी, ऐसा हमारी माताएं सर्दियों में हमें बताती रही है।

— गैस की समस्या होने पर खाने में अजवाइन को मिलना शुरू कर दे या खाना खाने के बाद थोड़ी अजवाइन तवे पर सेंक कर थोड़ा काला नमक मिलाकर जरूर खाएं, तीन दिन के अंदर गैस की समस्या से समाधान मिल जाएगा।

— पित्त को सम रखने के लिए अजवाइन के बाद कोई चीज यदि है तो वह है जीरा। काला जीरा, सफेद जीरा से अच्छा होता है। जीरे के बाद रिंग का नंबर आता है। इसे भी भगवान ने ही बनाया है। हींग के पहाड़ होते हैं।

— इसके बाद धनिया का नंबर आता है। जब तक हरा धनिया है जब हरा धनिया खाइए। इसके बाद सूखा धनिया खाइए। दोनों के गुण बराबर होते हैं। पित्त को सम करने के लिए रसोई में कुल 108 चीज हैं।

पित्त को नियंत्रित करने के लिए सबसे अच्छा देसी गाय का घी है। भैंस का घी कुश्ती लड़ने वाले पहलवानों के लिए सबसे अच्छा होता है। इन्हें गाय का घी नहीं खाना चाहिए अन्यथा ये लोग बीमार पड़ सकते हैं। घी बरसात और गर्मी के समय में अधिक खाना चाहिए।

5.देसी गाय का घी

— पित्त को नियंत्रित करने के लिए सबसे अच्छा देसी गाय का घी है। भैंस का घी कुश्ती लड़ने वाले पहलवानों के लिए सबसे अच्छा होता है। इन्हें गाय का घी नहीं खाना चाहिए अन्यथा ये लोग बीमार पड़ सकते हैं। घी बरसात और गर्मी के समय में अधिक खाना चाहिए।

गर्मी के दिनों में पित्त धड़कता है, इसीलिए ऐसा खाना चाहिए जो जल्दी हजम हो सके। बारिश के दिनों में पित्त सम रहता है। इसलिए बरसात के महीना में भोजन हल्का होना चाहिए। इस समय शरीर में पानी बहुत होता है। हरी पत्तियों की सब्जियों में पानी अधिक होता है। शरीर के लिए ज्यादा पानी भी अच्छा नहीं है और कम पानी भी अच्छा नहीं है।

6.अजवाइन पित्तनाशक है।

— अजवाइन पित्तनाशक है। देसी गाय के घी के बाद पित्त को संतुलित करने में अजवाइन का स्थान है। पित्त की बीमारियां जैसे एसिडिटी, हाइपर एसिडिटी, अल्सर, मुंह में पानी आना, खाने का हजम न होना, खाना खाने के 2 से 3 घंटे बाद भी खाने का स्वाद मुंह में रहना, डकारें आना, हिचकी आना आदि।

— धनिया, जीरा, अजवाइन खाने से पेट की गैस खत्म हो जाएगी, ऐसा हमारी माताएं सर्दियों में हमें बताती रही है।

— गैस की समस्या होने पर खाने में अजवाइन को मिलना शुरू कर दे या खाना खाने के बाद थोड़ी अजवाइन तवे पर सेंक कर थोड़ा काला नमक मिलाकर जरूर खाएं, तीन दिन के अंदर गैस की समस्या से समाधान मिल जाएगा।

— पित्त को सम रखने के लिए अजवाइन के बाद कोई चीज यदि है तो वह है जीरा। काला जीरा, सफेद जीरा से अच्छा होता है। जीरे के बाद रिंग का नंबर आता है। इसे भी भगवान ने ही बनाया है। हींग के पहाड़ होते हैं।

जब तक हरा धनिया है जब हरा धनिया खाइए। इसके बाद सूखा धनिया खाइए। दोनों के गुण बराबर होते हैं। पित्त को सम करने के लिए रसोई में कुल 108 चीज हैं।

   --- पित्त को नियंत्रित करने के लिए सबसे अच्छा देसी गाय का घी है। भैंस का घी कुश्ती लड़ने वाले पहलवानों के लिए सबसे अच्छा होता है। इन्हें गाय का घी नहीं खाना चाहिए अन्यथा ये लोग बीमार पड़ सकते हैं। घी बरसात और गर्मी के समय में अधिक खाना चाहिए।
Batch of fresh parsley, cilantro, tied with craft rope, isolated on whte table

7.हरा धनिया

— इसके बाद धनिया का नंबर आता है। जब तक हरा धनिया है जब हरा धनिया खाइए। इसके बाद सूखा धनिया खाइए। दोनों के गुण बराबर होते हैं। पित्त को सम करने के लिए रसोई में कुल 108 चीज हैं।

— पित्त को नियंत्रित करने के लिए सबसे अच्छा देसी गाय का घी है। भैंस का घी कुश्ती लड़ने वाले पहलवानों के लिए सबसे अच्छा होता है। इन्हें गाय का घी नहीं खाना चाहिए अन्यथा ये लोग बीमार पड़ सकते हैं। घी बरसात और गर्मी के समय में अधिक खाना चाहिए।

“आंखों के गुहेरी और कान के रोगों के घरेलू उपाय”

आंखों की पलकों के ऊपर कोने में फुंसी निकल आने को गुहेरी कहते हैं। यह एक गांठ की तरह होती है और हल्का-हल्का दर्द भी होता है। इसको ठीक करने के घरेलू उपाय निम्न प्रकार है।

— लॉन्ग को पानी में घिसकर लगाने से भी गुहेरी बैठ जाती है।

— रात में भिगोए हुए त्रिफला चूर्ण के पानी से आंखों को छापे मार कर धोए। बीमारी में काफी लाभ होगा।

— बकरी का दूध गुड्डी पर लगाने से आराम होता है।

— गुलाब जल में छोटी हरड़ को घिसकर लेप करने से लाभ मिलता है।

— अनार का रस आंखों में लगाने से काफी लाभ होता है।

— छुआरे के गुठली को सील पर पीसकर गुहेरी पर लगाएं।

कान के कई प्रकार के रोग होते हैं। जैसे कान का बहाना, फोड़े फुंसी, कर्णशूल, बहरापन आदि है।

फोड़े फुंसी और दर्द

— कान में फोड़े फुंसी और दर्द होने पर निम्नलिखित उपचार कर सकते हैं।

— सरसों का तेल कान में डालने से फोड़े फुंसी ठीक होते हैं।

— तिल्ली के तेल में लहसुन की कलियां को पकाएं और यह तेल ठंडा होने पर कान में डालें।

— दर्द होने पर प्याज का रस गर्म करके कान में डालने पर आराम मिलेगा।

— तुलसी के पत्तों के रस में थोड़ा सा कपूर मिलाकर गर्म करें और कान में डालें।

— कान में गोमूत्र डालने से फोड़े फुंसी ठीक होते हैं।

— कान में स्वमूत्र डालने से कान का दर्द रुक जाता है।

— धतूरे का रस कान में डालने से कान का दर्द रुक जाता है।

— बरगद का दूध कान में डालने से कान का दर्द रुक जाता है।

“शीघ्रपतन से छुटकारा पाने के प्रभावी घरेलू उपाय”

शीघ्रपतन प्रातः उन लोगों को होता है जो प्राकृतिक विरुद्ध सहवास की प्रक्रिया अपनाते हैं। जैसे हस्तमैथुन, मुंह मिथुन करते हैं या अत्यधिक अश्लील साहित्य पढ़ते हैं। अथवा अत्यधिक संभोग में रत रहते हैं इस बीमारी का प्रमुख लक्षण यह है कि संभोग के समय पुरुष स्त्री को संतुष्ट करने से पूर्व ही स्खलित हो जाता है और उसी को शीघ्रपतन कहते हैं। कई बार तो स्त्री आलिंगन करने या चुंबन करने मात्र से ही पुरुष स्खलित हो जाता है लेकिन घरेलू चिकित्सा करने और अच्छा सहित पढ़ने से यह बीमारी आसानी से दूर हो सकती है। इसके कुछ घरेलू नुस्खे इस तरह है:-

— प्रातः काल खाली पेट एक पका हुआ केला एक चम्मच गाय के घी के साथ लगातार एक महीने खाने से यह बीमारी दूर होती है।

— उड़द का आता घी में भूनकर और चीनी की जगह मिश्री डालकर हलवा बनाएं तथा अपनी पाचनशक्ति के अनुसार प्रातःकाल खाएं लगातार खाने से शीघ्रपतन कम होता जाएगा।

— 10 ग्राम घी+ 5 ग्राम शहर +10 ग्राम मुलहट्टी मिलाकर चाटें तथा गर्म दूध भी पिए यह सहवास के पश्चात ही लें तो शीघ्रपतन धीरे-धीरे दूर होगा और कमजोरी भी दूर होगी।

— छुहारे की खीर बनाकर ठंडा करके खाए इससे वीर्य पुष्ट होगा।

— दालचीनी का तेल तथा जैतून का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर उससे रात को सोने से पूर्व लिंग का मालिक करें तो लिंग में कठोरता आएगी।

— सरसों एवं अरंड के बीच बराबर मात्रा में लेकर पाउडर बना लें तथा तिल के तेल में मिलाकर लिंग की मालिश करें।

— लॉन्ग का तेल लिंग पर लगाकर सहवास करने से शीघ्रपतन दूर होता है।

— 8 बादाम की गिरी+ 8 दाने काली मिर्च+ 5 ग्राम सौंठ तथा मिस्त्री मिलाकर पीस ले तथा प्रतिदिन सुबह दूध के साथ लें । स्तंभन शक्ति बढ़ेगी।

— धात जाने -Nux Vomica 1m सुबह खाली पेट प्रत्येक एक-एक घंटे में तीन बार देना है।

“मूत्र संबंधित समस्याओं के घरेलू उपचार”

इस रोग में मूत्राशय में दर्द होता है और बार-बार पेशाब जाने की इच्छा होती है और पेशाब करते समय मूत्राशय में जलन और दर्द होता है। कष्ट के साथ पेशाब आता है। इस बीमारी के घरेलू उपचार निम्नलिखित है:-

— प्रतिदिन गाजर का रस पीने से जलन में आराम मिलता है।

— 5-6 ताजे आवाले का रस निकालकर उसमें शहद मिलाकर पिए।

— त्रिफला चूर्ण का काढ़ा गुड़ मिलकर पीने से आराम मिलता है।

— दो प्याज की गांठ को बारीक काटकर एक गिलास पानी में उबले पानी आधा रहने पर छान कर पिए।

— अनार के छिलके का पाउडर बनाएं। ताजा पानी में एक चम्मच पाउडर दो-तीन बार प्रतिदिन सेवन करें।

— ककड़ी को बारीक काटकर और उसमें मिश्री मिलाकर सलाद के रूप में खाने से पेशाब का रोग खत्म होता है।

— 4 चम्मच मूली का रस जरा सा सेंधा नमक डालकर पिए।

“उच्च रक्तचाप के घरेलू उपाय: आपके स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए”

उच्च रक्तचाप

उच्च रक्तचाप हृदय, गुर्दे और रक्त संचालन प्रणाली की गड़बड़ी के कारण होता है। यह रोग किसी को भी हो सकता है। यह चुपके-चुपके शरीर में आता है और कई तरह की बीमारियों को साथ लाता है। कई वर्षों तक तो इस रोग का पता ही नहीं चलता लेकिन जब पूर्ण रूप से इसका प्रकोप होता है। तब पता चलता है। जो लोग क्रोध, भय, दुःख या अन्य भावनाओं के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। उन्हें यह रोग अधिक होता है। जो लोग परिश्रम कम करते हैं तथा अधिक तनाव में रहते हैं, शराब या धूम्रपान अधिक करते हैं, उन्हें भी होता है। इसमें सिर में दर्द होता है और चक्कर आने लगता है। दिल की धड़कन तेज हो जाती है। आलस्य होना, जी घबराना, काम में मन ना लगना, पाचन क्षमता कम होना, और आंखों के सामने अंधेरा आना, नींद न आना और यदि लक्षण होते हैं। इनके घरेलू उपाय निम्नलिखित है।

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घरेलू उपाय

— दालचीनी का पाउडर पत्थर पर पीसकर आधा चम्मच रोज सुबह खाली पेट गुनगुने पानी के साथ लें ।आधा चम्मच शहद और आधा चम्मच दालचीनी का पाउडर गुनगुने पानी के साथ लें ।मेथी दाना और एक चम्मच एक गिलास गर्म पानी में शाम को भिगो दे और सुबह खाली पेट पानी पी लीजिए और दाना चबा चबाकर खा लीजिए। आधा चम्मच अर्जुन की छाल का पाउडर आधा गिलास गर्म पानी के साथ सुबह-सुबह खाली पेट लें। काढ़े की तरह, यह हाई बीपी, कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड, मोटापा, हॉट में ब्लॉकेज ठीक करता है। लौकी का रस आधा कप सुबह खाली पेट नाश्ता करने से 1 घंटे पहले पांच धनिया पता, पांच पुदीना पता, पांच तुलसी पता, 4 से 5 काली मिर्च मिलाकर लें ।पांच बेलपत्र के पत्तों को पत्थर पर पीसकर चटनी बना लें और एक गिलास पानी में तब तक उबाले जब तक की आधा न हो जाए और उसके बाद चाय की तरह पी लें ,बेलपत्र शुगर को भी नॉर्मल करता है। गोमूत्र आधा कप रोज खाली सुबह खाली पेट लें।

कच्चे लहसुन से रक्तचाप कम होता है।

— कच्चे लहसुन की एक दो कली पीसकर प्रातः काल चाटने से उच्च रक्तचाप समान होता है।

— शहद में नींबू का रस मिलाकर सुबह-शाम चाटने से रक्तचाप कम होता है।

कोमल नीम की पत्ती से उच्च रक्तचाप कम होता है।

— कोमल नीम की पत्ती चबाने से या उनका रस निकालकर पीने से भी रक्तचाप कम होता है और ठीक भी होता है।

— प्रातःकाल देशी गाय का गोमूत्र पीने से उच्च रक्तचाप कम होता है।

— प्रतिदिन रात को गर्म पानी में त्रिफला चूर्ण लेने से यह बीमारी दूर होती है।

आंवले का रस से उच्च रक्तचाप कम होता है।

— आंवले का रस सबसे अधिक लाभकारी है अथवा आंवले का मुरब्बा भी ले सकते हैं। खाने में मूली का नियमित सेवन करें।

— गर्म पानी में नींबू निचोड़ कर और उसमें शहद मिलाकर (गुनगुने पानी में )लगातार 15 दिन तक पानी पिएं उच्च रक्तचाप समान होता जाएगा।

लौकी सब्जियों में सबसे ज्यादा क्षारीय है।

— उच्च रक्त दबाव रक्त की अमलता बढ़ने के कारण होता है, आत: ऐसी स्थिति में क्षारीय चीजें अधिक खाए। जैसे मेथी, गाजर कोई भी ऐसा फल जिसमें रस नहीं है जैसे – सेवा, केला, अमरूद, पलक, बैगन का उपयोग करें। आलू न अम्लीय है न क्षारीय है। हरे पत्ते की कोई भी सब्जी क्षारीय होती है। इससे उच्च रक्त दबाव कम होगा, ट्राईग्लिसराइड कम होगा, कोलेस्ट्रॉल कम होगा, मोटापा कम होगा। इससे ब्लॉकेज भी निकल जाते हैं। लौकी( दूध) भी क्षारीय है। लौकी सब्जियों में सबसे ज्यादा क्षारीय है। लौकी का रस भी पी सकते हैं।

उच्च रक्तचाप हृदय, गुर्दे और रक्त संचालन प्रणाली की गड़बड़ी के कारण होता है। यह रोग किसी को भी हो सकता है। यह चुपके-चुपके शरीर में आता है और कई तरह की बीमारियों को साथ लाता है। कई वर्षों तक तो इस रोग का पता ही नहीं चलता लेकिन जब पूर्ण रूप से इसका प्रकोप होता है। तब पता चलता है। जो लोग क्रोध, भय, दुःख या अन्य भावनाओं के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। उन्हें यह रोग अधिक होता है। जो लोग परिश्रम कम करते हैं तथा अधिक तनाव में रहते हैं, शराब या धूम्रपान अधिक करते हैं, उन्हें भी होता है। इसमें सिर में दर्द होता है और चक्कर आने लगता है। दिल की धड़कन तेज हो जाती है। आलस्य होना, जी घबराना, काम में मन ना लगना, पाचन क्षमता कम होना, और आंखों के सामने अंधेरा आना, नींद न आना और यदि लक्षण होते हैं। इनके घरेलू उपाय निम्नलिखित है।

— दालचीनी का पाउडर पत्थर पर पीसकर आधा चम्मच रोज सुबह खाली पेट गुनगुने पानी के साथ लें ।आधा चम्मच शहद और आधा चम्मच दालचीनी का पाउडर गुनगुने पानी के साथ लें ।मेथी दाना और एक चम्मच एक गिलास गर्म पानी में शाम को भिगो दे और सुबह खाली पेट पानी पी लीजिए और दाना चबा चबाकर खा लीजिए। आधा चम्मच अर्जुन की छाल का पाउडर आधा गिलास गर्म पानी के साथ सुबह-सुबह खाली पेट लें। काढ़े की तरह, यह हाई बीपी, कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड, मोटापा, हॉट में ब्लॉकेज ठीक करता है। लौकी का रस आधा कप सुबह खाली पेट नाश्ता करने से 1 घंटे पहले पांच धनिया पता, पांच पुदीना पता, पांच तुलसी पता, 4 से 5 काली मिर्च मिलाकर लें ।पांच बेलपत्र के पत्तों को पत्थर पर पीसकर चटनी बना लें और एक गिलास पानी में तब तक उबाले जब तक की आधा न हो जाए और उसके बाद चाय की तरह पी लें ,बेलपत्र शुगर को भी नॉर्मल करता है। गोमूत्र आधा कप रोज खाली सुबह खाली पेट लें।

शहद में नींबू का रस से रक्तचाप कम होता है।

— कच्चे लहसुन की एक दो कली पीसकर प्रातः काल चाटने से उच्च रक्तचाप समान होता है।

— शहद में नींबू का रस मिलाकर सुबह-शाम चाटने से रक्तचाप कम होता है।

गर्म पानी में त्रिफला चूर्ण लेनेसे उच्च रक्तचाप कम होता है।

— कोमल नीम की पत्ती चबाने से या उनका रस निकालकर पीने से भी रक्तचाप कम होता है और ठीक भी होता है।

— प्रातःकाल देशी गाय का गोमूत्र पीने से उच्च रक्तचाप कम होता है।

— प्रतिदिन रात को गर्म पानी में त्रिफला चूर्ण लेने से यह बीमारी दूर होती है।

आंवले का रस से उच्च रक्तचाप कम होता है।

— आंवले का रस सबसे अधिक लाभकारी है अथवा आंवले का मुरब्बा भी ले सकते हैं। खाने में मूली का नियमित सेवन करें।

— गर्म पानी में नींबू निचोड़ कर और उसमें शहद मिलाकर (गुनगुने पानी में )लगातार 15 दिन तक पानी पिएं उच्च रक्तचाप समान होता जाएगा।

— उच्च रक्त दबाव रक्त की अमलता बढ़ने के कारण होता है, आत: ऐसी स्थिति में क्षारीय चीजें अधिक खाए। जैसे मेथी, गाजर कोई भी ऐसा फल जिसमें रस नहीं है जैसे – सेवा, केला, अमरूद, पलक, बैगन का उपयोग करें। आलू न अम्लीय है न क्षारीय है। हरे पत्ते की कोई भी सब्जी क्षारीय होती है। इससे उच्च रक्त दबाव कम होगा, ट्राईग्लिसराइड कम होगा, कोलेस्ट्रॉल कम होगा, मोटापा कम होगा। इससे ब्लॉकेज भी निकल जाते हैं। लौकी( दूध) भी क्षारीय है। लौकी सब्जियों में सबसे ज्यादा क्षारीय है। लौकी का रस भी पी सकते हैं।

“त्रिदोष: आयुर्वेद में रोगों के निदान और उपचार का गहरा ज्ञान” (वात, पित्त, कफ)

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त्रिदोष

त्रिदोष एक पूर्ण वैज्ञानिक सिद्धांत है जो आयुर्वेद की अद्भुत खोज है। इसके द्वारा रोग का निदान या उपचार के अतिरिक्त रोगी की प्रकृति समझने में सहायता मिलती है। त्रिदोष का मतलब होता है वात- पित्त- कफ। यदि त्रिदोष समावस्था में है तो शरीर स्वस्थ होगा और विषमावस्था में है तो अस्वस्थ होगा। वास्तव में वात, पित्त, कफ समावस्था में दोष नहीं होते बल्कि धातुएं होती है जो शरीर को धारण करती है और उसे स्वस्थ रखती हैं। जब ये धातुऐं दूषित या विषम होकर रोग पैदा करती हैं तो यह दोष कहलाता है।

रोग होने पर फिर से त्रिदोष का संतुलन आवश्यक है। साधारण व्यक्ति के लिए समझदारी इसी में हैं कि वह जितना संभव हो सके रोग से बचने का प्रयास करें। ना कि रोग होने के बाद डॉक्टर के पास इलाज के लिए भागे। कहा भी गया है इलाज से बचाव सदा ही उत्तम है। त्रिदोष के असंतुलन से बचने के लिए ऋतुचर्या, दिनचर्या, आहार-विहार का पालन आवश्यक है। आयुर्वेद में परहेज पालन के महत्व को आजकल आधुनिक डॉक्टर भी समझने लग गए हैं और अवश्यक परहेज पालन पर जोर देने लग गए हैं।

आयुर्वेद में रोगों के निदान

भारत के लोगों को 70 से 75 प्रतिशत रोग वात के है। 12 से 13 प्रतिशत रोग पित्त के हैं तथा 10 से 12% कफ के हैं। रोज हमारे शरीर में वात, पित्त और कफ की स्थिति स्थिर नहीं रहती है। सुबह वात अधिक होता है, दोपहर में पित्त हावी होता है और शाम को कफ की अधिकता होती है। यह पूरे 24 घंटे के क्रम की स्थिति है।

उपचार का गहरा ज्ञान

निरोग मतलब शरीर, मन और चित्त से स्वस्थ। ऐसा वात, पित्त, कफ तीनों के सम होने की स्थिति में ही संभव है। सम मतलब जितना बात चाहिए, जितना कफ चाहिए और जितना पित्त चाहिए इतना ही है। वात, पित्त और कफ शरीर के ऐसे दोष है जिसके बिना शरीर कम ही नहीं कर सकता है अर्थात जलवायु और मौसम के हिसाब से शरीर को जैसी आवश्यकता हो उसी क्रम में उनकी स्थिति शरीर में होनी चाहिए।

वात/ वायु का स्थान है कमर से अंगूठे (पर के) तक, पित्त का स्थान है कमर से छाती तक और कफ का स्थान है छाती से सिर तक। स्वस्थ रहने की दृष्टि से ये तीनों अपने अपने स्थान से हिलने नहीं चाहिए अर्थात सब अपने अपने क्षेत्र में रहने चाहिए और इसकी मात्रा में असमानता नहीं आनी चाहिए।

त्रिदोष

त्रिदोष एक पूर्ण वैज्ञानिक सिद्धांत है जो आयुर्वेद की अद्भुत खोज है। इसके द्वारा रोग का निदान या उपचार के अतिरिक्त रोगी की प्रकृति समझने में सहायता मिलती है। त्रिदोष का मतलब होता है वात- पित्त- कफ। यदि त्रिदोष समावस्था में है तो शरीर स्वस्थ होगा और विषमावस्था में है तो अस्वस्थ होगा। वास्तव में वात, पित्त, कफ समावस्था में दोष नहीं होते बल्कि धातुएं होती है जो शरीर को धारण करती है और उसे स्वस्थ रखती हैं। जब ये धातुऐं दूषित या विषम होकर रोग पैदा करती हैं तो यह दोष कहलाता है।

रोग होने पर फिर से त्रिदोष का संतुलन आवश्यक है। साधारण व्यक्ति के लिए समझदारी इसी में हैं कि वह जितना संभव हो सके रोग से बचने का प्रयास करें। ना कि रोग होने के बाद डॉक्टर के पास इलाज के लिए भागे। कहा भी गया है इलाज से बचाव सदा ही उत्तम है। त्रिदोष के असंतुलन से बचने के लिए ऋतुचर्या, दिनचर्या, आहार-विहार का पालन आवश्यक है। आयुर्वेद में परहेज पालन के महत्व को आजकल आधुनिक डॉक्टर भी समझने लग गए हैं और अवश्यक परहेज पालन पर जोर देने लग गए हैं।

आयुर्वेद में रोगों के निदान

भारत के लोगों को 70 से 75 प्रतिशत रोग वात के है। 12 से 13 प्रतिशत रोग पित्त के हैं तथा 10 से 12% कफ के हैं। रोज हमारे शरीर में वात, पित्त और कफ की स्थिति स्थिर नहीं रहती है। सुबह वात अधिक होता है, दोपहर में पित्त हावी होता है और शाम को कफ की अधिकता होती है। यह पूरे 24 घंटे के क्रम की स्थिति है।

उपचार का गहरा ज्ञान

निरोग मतलब शरीर, मन और चित्त से स्वस्थ। ऐसा वात, पित्त, कफ तीनों के सम होने की स्थिति में ही संभव है। सम मतलब जितना बात चाहिए, जितना कफ चाहिए और जितना पित्त चाहिए इतना ही है। वात, पित्त और कफ शरीर के ऐसे दोष है जिसके बिना शरीर कम ही नहीं कर सकता है अर्थात जलवायु और मौसम के हिसाब से शरीर को जैसी आवश्यकता हो उसी क्रम में उनकी स्थिति शरीर में होनी चाहिए।

वात/ वायु का स्थान है कमर से अंगूठे (पर के) तक, पित्त का स्थान है कमर से छाती तक और कफ का स्थान है छाती से सिर तक। स्वस्थ रहने की दृष्टि से ये तीनों अपने अपने स्थान से हिलने नहीं चाहिए अर्थात सब अपने अपने क्षेत्र में रहने चाहिए और इसकी मात्रा में असमानता नहीं आनी चाहिए।

“स्वस्थ जीवन शैली: आयुर्वैदिक कला और उपचार”

flat lay photo of alternative medicines

नोट: इस भाग में बताए गए सभी उपचार, भाग 1 में दिए गए स्वस्थ रहने के नियमों के पालन करने पर ही लाभकारी होंगे।

स्वस्थ जीवन शैली

  1. फलों का रस रात में नहीं खानी चाहिए।

2. घी या तेल की चीजें खाने के बाद तुरंत पानी नहीं पीना चाहिए बल्कि एक-डेढ़ घंटे के बाद पानी पीना चाहिए।

3. भोजन के तुरंत बाद अधिक तेज चलना या दौड़ना हानिकारक है। इसीलिए कुछ देर आराम करके ही जाना चाहिए।

4. शाम को भोजन के बाद शुद्ध हवा में टहलना चाहिए खान के तुरंत बाद सो जाने से पेट की गड़बड़ियां हो जाती है।

5. प्रातः काल जल्दी उठना चाहिए और खुली हवा में व्यायाम या शरीर श्रम आवश्यक करना चाहिए।

6. तेज धूप में चलने के बाद, शारीरिक मेहनत करने के बाद या शौच जाने के तुरंत बाद पानी कदापि नहीं पीना चाहिए।

7. केवल शहद और घी बराबर मात्रा में मिलाकर नहीं खाना चाहिए वह विष हो जाता है।

8. खाने पीने में विरोधी पदार्थों को एक साथ नहीं लेना चाहिए जैसे दूध और कटहल, दूध और दही, मछली और दूध आदी चीजें एक साथ नहीं लेनी चाहिए।

9. सर पर कपड़ा बांधकर या मोजे पहनकर कभी नहीं सोना चाहिए।

10. बहुत तेज या धीमी रोशनी में पढ़ाई, अत्यधिक टी वी या सिनेमा देखना, अधिक गर्म-ठंडी चीजों का सेवन करना, अधिक मिर्च मसाला का प्रयोग करना, तेज धूप में चलना इन सबसे बचना चाहिए। यदि तेज धूप में चलना भी हो तो सिर पर या काम पर कपड़ा बांधकर चलना चाहिए।

11. रोगी को हमेशा गर्म अथवा गुनगुना पानी ही पिलाना चाहिए और रोगी को ठंडी हवा, परिश्रम, तथा क्रोध से बचना चाहिए।

12. आयुर्वेद में लिखा है कि निंद्रा से कफ शांत होता है, मालिश से वायु कम होती है, उल्टी से पित्त कम होता है, और लंघन (भूखा रहना) करने से बुखार शांत होता है। इसके लिए घरेलू चिकित्सा करते समय इन बातों का अवश्य ध्यान रखना चाहिए।

13. आग या किसी गर्म चीज से जल जाने पर जले भाग को ठंडे पानी में डालकर रखना चाहिए।

कान में दर्द

14. कान में दर्द होने पर यदि पत्तों का रस कान में डालना हो तो सूर्योदय के पहले या सूर्यास्त के बाद ही डालना चाहिए।

15. किसी भी रोगी को तेल, घी या अधिक चिकने पदार्थों के सेवन से बचना चाहिए।

16. अजीर्ण तथा मंदाग्नि दूर करने वाली दवाई हमेशा भोजन के बाद ही लेनी चाहिए।

17. मल रुकने या कब्ज होने की स्थिति में यदि दस्त कराने हों तो प्रातः काल ही कराने चाहिए, रात्रि में नहीं।

18. यदि घर में किशोरी या युवती को मिर्गी के दौरे पड़ते हो तो उसे उल्टी दस्त या लंघन नहीं कराना चाहिए।

19. यदि किसी दवा को पतले पदार्थ में मिलाना हो तो चाय, कॉफी या दूध में न मिलाकर छाछ, नारियल पानी या सादे पानी में ही मिलाना चाहिए।

20. हींग को सदैव देशी घी में भून कर ही उपयोग में लाना चाहिए। लेप में कच्ची हींग लगानी चाहिए।

21. पुस्तक में दिए गए उपचारों में से एक बार में एक ही उपचार उपयोग करें और किसी योग्य चिकित्सक की देखरेख में ही करें।

purple petaled flowers in mortar and pestle
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आयुर्वैदिक कला और उपचार

22. फलों का रस, अत्यधिक तेल की चीजें, मठ्ठा खट्टा चीज रात में नहीं खानी चाहिए

23. घी या तेल की चीजें खाने के बाद तुरंत पानी नहीं पीना चाहिए बल्कि एक-डेढ़ घंटे के बाद पानी पीना चाहिए।

24. भोजन के तुरंत बाद अधिक तेज चलना या दौड़ना हानिकारक है। इसीलिए कुछ देर आराम करके ही जाना चाहिए।

25. शाम को भोजन के बाद शुद्ध हवा में टहलना चाहिए खान के तुरंत बाद सो जाने से पेट की गड़बड़ियां हो जाती है।

26. प्रातः काल जल्दी उठना चाहिए और खुली हवा में व्यायाम या शरीर श्रम आवश्यक करना चाहिए।

abstract beach bright clouds
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तेज धूप

27. तेज धूप में चलने के बाद, शारीरिक मेहनत करने के बाद या शौच जाने के तुरंत बाद पानी कदापि नहीं पीना चाहिए।

milk and honey on wooden tray
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शहद और घी

28. केवल शहद और घी बराबर मात्रा में मिलाकर नहीं खाना चाहिए वह विष हो जाता है।

29. खाने पीने में विरोधी पदार्थों को एक साथ नहीं लेना चाहिए जैसे दूध और कटहल, दूध और दही, मछली और दूध आदी चीजें एक साथ नहीं लेनी चाहिए।

30. सर पर कपड़ा बांधकर या मोजे पहनकर कभी नहीं सोना चाहिए।

31. बहुत तेज या धीमी रोशनी में पढ़ाई, अत्यधिक टी वी या सिनेमा देखना, अधिक गर्म-ठंडी चीजों का सेवन करना, अधिक मिर्च मसाला का प्रयोग करना, तेज धूप में चलना इन सबसे बचना चाहिए। यदि तेज धूप में चलना भी हो तो सिर पर या काम पर कपड़ा बांधकर चलना चाहिए।

glass jug with water and lime
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गुनगुना पानी

32. रोगी को हमेशा गर्म अथवा गुनगुना पानी ही पिलाना चाहिए और रोगी को ठंडी हवा, परिश्रम, तथा क्रोध से बचना चाहिए।

33. आयुर्वेद में लिखा है कि निंद्रा से कफ शांत होता है, मालिश से वायु कम होती है, उल्टी से पित्त कम होता है, और लंघन (भूखा रहना) करने से बुखार शांत होता है। इसके लिए घरेलू चिकित्सा करते समय इन बातों का अवश्य ध्यान रखना चाहिए।

34. आग या किसी गर्म चीज से जल जाने पर जले भाग को ठंडे पानी में डालकर रखना चाहिए।

35. कान में दर्द होने पर यदि पत्तों का रस कान में डालना हो तो सूर्योदय के पहले या सूर्यास्त के बाद ही डालना चाहिए।

36. किसी भी रोगी को तेल, घी या अधिक चिकने पदार्थों के सेवन से बचना चाहिए।

37. अजीर्ण तथा मंदाग्नि दूर करने वाली दवाई हमेशा भोजन के बाद ही लेनी चाहिए।

38. मल रुकने या कब्ज होने की स्थिति में यदि दस्त कराने हों तो प्रातः काल ही कराने चाहिए, रात्रि में नहीं।

39. यदि घर में किशोरी या युवती को मिर्गी के दौरे पड़ते हो तो उसे उल्टी दस्त या लंघन नहीं कराना चाहिए।

40. यदि किसी दवा को पतले पदार्थ में मिलाना हो तो चाय, कॉफी या दूध में न मिलाकर छाछ, नारियल पानी या सादे पानी में ही मिलाना चाहिए।

41. हींग को सदैव देशी घी में भून कर ही उपयोग में लाना चाहिए। लेप में कच्ची हींग लगानी चाहिए।

42. पुस्तक में दिए गए उपचारों में से एक बार में एक ही उपचार उपयोग करें और किसी योग्य चिकित्सक की देखरेख में ही करें।

“सुबह की लार के चमत्कार: देसी नुस्खे और उनके गुण”

सुबह की लार के चमत्कार

1. सुबह की लार दुनिया की सबसे अच्छी औषधि है। इसमें औषधीय गुण बहुत अधिक है। किसी चोट पर लार लगाने से चोट ठीक हो जाती है। लार पैदा होने में एक लाख ग्रंथियों का काम होता है। जब कफ बहुत बढा़ हुआ हो तभी आप थूक सकते हैं अन्यथा लार कभी नहीं थूकना चाहिए। सुबह की लार बहुत क्षारीय होती है। इसका PH 8.4 के आस पास होता है.

2. पान बिना कथा, सुपारी और जर्दे ,(तंबाकू) का खाना चाहिए जिससे कि उसकी लार को थूकना ना पड़े। कत्था और जर्दा कैंसर करता है इसीलिए इसे लार के साथ अंदर नहीं ले सकते हैं। गहरे रंग की वनस्पतियां कैंसर, मधुमेह, अस्थमा जैसी बीमारियों से बचाती है। पान कफ और पित दोनों का नाश करता है। चूना वात का नाश करता है। जिस वनस्पति का रंग जितना ज्यादा गहरा हो वह उतनी ही बड़ी औषधि है।

3. देसी पान (गहरे रंग वाला जो कसेला हो) गेहूं के दाने के बराबर चूना मिलाएं, सौंफ मिलाएं, अजवाइन डालें,बड़ी इलायची, गुलाब के फूल का रस (गुलकंद) मिलाकर खाएं।

4. ब्रह्म मुहूर्त की लार अथवा सुबह उठते ही मुंह में जो लार होती है, वह बाकी के समय से ज्यादा फायदेमंद होती है। इसलिए सुबह उठते ही ये लार अंदर जानी ही चाहिए।

5. शरीर के घाव जो कि किसी दवा से ठीक नहीं हो रहे हो, उस पर सुबह उठते ही अपनी बासी मुंह की लार लगानी चाहिए 15 से 20 दिन में घाव भरने लगता है और 3 महीने के अंदर घाव पूरी तरह ठीक हो जाएगा। गैंग्रीन जैसी बीमारी 2 साल में ठीक हो जाएगी। जानवर अपना सब घाव चाट चाट कर ठीक कर लेते हैं।

human lips
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लार में 18 पोषक तत्व होते हैं

6. सुबह की लार में वही 18 पोषक तत्व होते हैं जो कि मिट्टी में होते हैं। शरीर का किसी भी प्रकार के दाग धब्बे हो, सुबह की लार लगाने लगाते रहने से 1 साल के अंदर सब ठीक कर देती है। एक्जिमा और सोराइसिस जैसी बीमारियों को भी सुबह की लार से ठीक हो सकते हैं। 1 साल के अंदर परिणाम मिल जाते हैं।

7. सुबह की लार आंखों में लगाने से आंखों की रोशनी बढ़ती है और आंखों के चश्में उतर जाते हैं। आंखें लाल होने की बीमारी सुबह की लार लगाने से 24 घंटे के अंदर ठीक होती है। सुबह सुबह की लार, आंखें टेढ़ी हो अथवा आंखों में भेंगापन की बीमारी हो, को सही कर देती है।

8. आंखों के नीचे के काले धब्बों के लिए रोज सुबह की लार (बासी) लगाएं। सुबह उठने के 48 मिनट के बाद मुंह की लार की क्षारीयता कम हो जाती है।

9. जितने की टूथपेस्ट है सब एंटी एल्कलाइन है। इसमें एक केमिकल होता है, सोडियम लारेल सल्फेट जो लार की ग्रंथियों को पूरी तरह से सुखा देता है। नीम की दातुन चबाते समय बनने वाली लार को पीते रहना चाहिए।

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लार दुनिया की सबसे अच्छी औषधि है।

10. सुबह की लार दुनिया की सबसे अच्छी औषधि है। इसमें औषधीय गुण बहुत अधिक है। किसी चोट पर लार लगाने से चोट ठीक हो जाती है। लार पैदा होने में एक लाख ग्रंथियों का काम होता है। जब कफ बहुत बढा़ हुआ हो तभी आप थूक सकते हैं अन्यथा लार कभी नहीं थूकना चाहिए। सुबह की लार बहुत क्षारीय होती है। इसका PH 8.4 के आस पास होता है.

11. पान बिना कथा, सुपारी और जर्दे ,(तंबाकू) का खाना चाहिए जिससे कि उसकी लार को थूकना ना पड़े। कत्था और जर्दा कैंसर करता है इसीलिए इसे लार के साथ अंदर नहीं ले सकते हैं। गहरे रंग की वनस्पतियां कैंसर, मधुमेह, अस्थमा जैसी बीमारियों से बचाती है। पान कफ और पित दोनों का नाश करता है। चूना वात का नाश करता है। जिस वनस्पति का रंग जितना ज्यादा गहरा हो वह उतनी ही बड़ी औषधि है।

12. देसी पान (गहरे रंग वाला जो कसेला हो) गेहूं के दाने के बराबर चूना मिलाएं, सौंफ मिलाएं, अजवाइन डालें,बड़ी इलायची, गुलाब के फूल का रस (गुलकंद) मिलाकर खाएं।

13. ब्रह्म मुहूर्त की लार अथवा सुबह उठते ही मुंह में जो लार होती है, वह बाकी के समय से ज्यादा फायदेमंद होती है। इसलिए सुबह उठते ही ये लार अंदर जानी ही चाहिए।

14. शरीर के घाव जो कि किसी दवा से ठीक नहीं हो रहे हो, उस पर सुबह उठते ही अपनी बासी मुंह की लार लगानी चाहिए 15 से 20 दिन में घाव भरने लगता है और 3 महीने के अंदर घाव पूरी तरह ठीक हो जाएगा। गैंग्रीन जैसी बीमारी 2 साल में ठीक हो जाएगी। जानवर अपना सब घाव चाट चाट कर ठीक कर लेते हैं।

15. सुबह की लार में वही 18 पोषक तत्व होते हैं जो कि मिट्टी में होते हैं। शरीर का किसी भी प्रकार के दाग धब्बे हो, सुबह की लार लगाने लगाते रहने से 1 साल के अंदर सब ठीक कर देती है। एक्जिमा और सोराइसिस जैसी बीमारियों को भी सुबह की लार से ठीक हो सकते हैं। 1 साल के अंदर परिणाम मिल जाते हैं।

    16. सुबह की लार आंखों में लगाने से आंखों की रोशनी बढ़ती है और आंखों के चश्में उतर जाते हैं। आंखें लाल होने की बीमारी सुबह की लार लगाने से 24 घंटे के अंदर ठीक होती है। सुबह सुबह की लार, आंखें टेढ़ी हो अथवा आंखों में भेंगापन की बीमारी हो, को सही कर देती है।

    17. आंखों के नीचे के काले धब्बों के लिए रोज सुबह की लार (बासी) लगाएं। सुबह उठने के 48 मिनट के बाद मुंह की लार की क्षारीयता कम हो जाती है।

    18. जितने की टूथपेस्ट है सब एंटी एल्कलाइन है। इसमें एक केमिकल होता है, सोडियम लारेल सल्फेट जो लार की ग्रंथियों को पूरी तरह से सुखा देता है। नीम की दातुन चबाते समय बनने वाली लार को पीते रहना चाहिए।

    “शारीरिक वेगों को नहीं रोकना चाहिए: आयुर्वेदिक और धार्मिक सलाह”

    शरीर के वेगों को कभी नहीं रोकना चाहिए जैसे नींद एक वेग है, इसे रोकना नहीं चाहिए क्योंकि वेगों को रोकने से भी बीमारियां उत्पन्न होती हैं।

    शारीरिक वेगों को नहीं रोकना चाहिए

    1. शरीर के वेगों को कभी नहीं रोकना चाहिए जैसे नींद एक वेग है, इसे रोकना नहीं चाहिए क्योंकि वेगों को रोकने से भी बीमारियां उत्पन्न होती हैं।

    2. हंंसी सहज रुप से आ रही है तो कभी मत रोकें। हंसी शरीर में बनने वाले कुछ अलग-अलग रसों (अलग-अलग ग्रंथियों से उत्पन्न होती है) के कारण पैदा होती है। मस्तिष्क में एक पिनियल ग्लैंड है जो बहुत मदद करता है हंसी आने के लिए, पिनियल ग्लैंड में कुछ रस बनते हैं जिनसे हंसी का सीधा संबंध होता है पहले ये रस पैदा होगा बाद में हंसी आएगी। ये रस भावना (शरीर की) के कारण सेकंड्स में उत्पन्न होता है। जबरदस्ती कभी नहीं हंसना चाहिए। क्योंकि बिना-भाव के और बिना रस की हंसी से शरीर को कोई लाभ नहीं होता है। ये पूरी तरह से यांत्रिक हंसी होती है। बिना रस और बिना भाव की हंसी में कभी भी पेट की नस पे नस चढ़ सकती है जिससे पेट दर्द या अन्य कई तकलीफें आ सकती है। ऐसी स्थिति में पेट का ऑपरेशन भी करना पड़ सकता है।

    3. शारीरिक वेगों को नहीं रोकना चाहिए, दूसरा एक वेग है, ना तो जबरदस्ती छींकने की कोशिश करें और न ही आती हुई छींक को रोकने की कोशिश करें। जबरदस्ती छीकने से 14 से 15 रोग शरीर में आ सकते हैं और आती हुई छींक को रोकने पर 23 से 24 रोग हो सकते हैं।

    आयुर्वेदिक और धार्मिक सलाह

    4. प्याज तीसरा वेग हैं जिसे कभी नहीं रुकना चाहिए। पानी कितनी भी प्यास में सिप-सिप करके पीना चाहिए। बिना प्याज के पानी सुबह-सुबह ही पी सकते हैं अन्यथा नहीं। सुबह मतलब ब्रह्म मुहूर्त यानी सूर्योदय से डेढ़ घंटे पहले का समय। प्यास रोकने से कुल 58 रोग शरीर में आते हैं। कुर्सी पर बैठकर पानी पीना भी सही नियम नहीं है।

    5. भूख के वेग रोकने से 103 रोग शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। जिसमें पहला रोग एसिडिटी का है और आखरी रोग आंत का कैंसर है।

    6. जम्हाई आने का वेग कभी ना रोकें शरीर के रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा कम होने के कारण जम्हाई आती है। क्योंकि इसी के माध्यम से रक्त में ऑक्सीजन की इस कमी की पूर्ति करने के लिए अतिरिक्त ऑक्सीजन की व्यवस्था होती है। इसीलिए जम्हाई को कभी न रोके। जहां अपनों से उच्च लोग बैठे हों उस अवस्था में थोड़ी दूर जाकर या मुंह घुमाकर जम्हाई लें ।प्रकृति का नियम है जितनी ऑक्सीजन लेंगे उसी समय में उतनी ही कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकलेगी।

    7. शारीरिक वेगों को नहीं रोकना चाहिए मूत्र वेग कभी रोकने की कोशिश न करें। इसको रोकने से रक्त के सारे विकार शरीर धारण कर लेगा यह वेग रोकने से शरीर के हर हिस्से में दबाव बढ़ जाता है। रक्त पर दबाए पड़ेगा तो सभी ग्रंथियों पर दबाव पड़ेगा। मूत्र का एक-एक कम आना किसी बीमारी के कारण होता है। मूत्र खुलकर आना और बार बार आना बीमारी नहीं है। ऐसी स्थिति में किसी विशेषज्ञ की मदद लें।

    8. मल का वेग कभी न रोकें। दिन में दो बार, समय कोई भी हो समान्य स्थिति है और 2 बार से अधिक जाने की अवस्था में कोई समस्या या बीमारी हो सकती है यानी रोज तीन तीन बार जाना थोड़ी असामान्य स्थिति है। लेकिन 3 बार से अधिक जाना मतलब निश्चित रूप से कोई समस्या या बीमारी की स्थिति है। इसके लिए किसी विशेषज्ञ की मदद ले

    आयुर्वेदिक और धार्मिक सलाह

    9. वीर्य का वेग साधु,संत, महंत, अथवा ब्रह्मचार्य का पालन करने वाले लोगों को ही रोकना चाहिए और अवश्य रोकना चाहिए। इसमें सभी कुंवारे लोग भी शामिल हैं। गृहस्थ जीवन जीने वाले लोगों को वीर्य का वेग कभी नहीं रोकना चाहिए। अर्थात काम वेग गृहस्थ लोगों को कभी नहीं रोकना चाहिए। ऐसा करना बहुत ही खराब माना गया है। ऐसा सिर्फ पति-पत्नी के परिपेक्ष्य में कहा गया है। कुंवारे लोगों के लिए इसका पहला नियम लागू होता है।

    10. वीर्य का वेग गृहस्थ लोगों के लिए भी कृत्रिम नहीं होना चाहिए अर्थात जबरदस्ती वीर्य के वेग को पैदा भी नहीं करना चाहिए। गृहस्थ नियमों के साथ ही इस नियम का पालन करना चाहिए। साधु, संत, महात्मा, ब्रह्मचारी इस तरह के लोग असामान्य श्रेणी के मनुष्य हैं। अर्थात ग्रस्त लोग साधारण श्रेणी के लोग हैं।