Cricket Clash: India vs. England – The Epic Showdown!

people in het himachal pradesh cricket association stadium in india

Cricket, often referred to as the gentleman’s game, has taken the world by storm with its gripping matches and passionate fan base. While it is loved and played in many countries, few matchups generate as much excitement and frenzy as an India vs. England cricket clash. These two cricketing giants have a storied history of fierce competition, and whenever they meet on the field, it’s nothing short of an epic showdown.

In this long-form article, we will delve into the world of cricket, exploring the rivalry between India and England, their historic clashes, star players, and the impact of these matchups on the cricketing world.

boys playing cricket
Photo by Patrick Case on Pexels.com

The History of the Rivalry

The rivalry between India and England in cricket dates back to the colonial era. Cricket was introduced to India by the British, and it didn’t take long for the sport to gain popularity. In the early 1930s, India played its first-ever Test match against England, marking the beginning of a competitive rivalry that would last for decades.

Iconic Encounters

Over the years, India and England have been involved in some iconic encounters that have left an indelible mark on the cricketing world. One such match was the 1971 Oval Test, where India clinched its first-ever Test series win on English soil. The image of captain Ajit Wadekar and his team holding the trophy aloft is etched in cricketing history.

Modern-Day Duels

Fast forward to the modern era, and the battles between these two cricketing powerhouses have only intensified. The introduction of shorter formats like One-Day Internationals (ODIs) and Twenty20 (T20) matches has added a new dimension to the rivalry. Fans now eagerly await limited-over clashes between India and England with bated breath.

Star Players

A key component of these epic showdowns is the presence of star players. India has seen legends like Sachin Tendulkar, Rahul Dravid, and Virat Kohli grace the field. England, on the other hand, boasts iconic cricketers such as Alastair Cook, Kevin Pietersen, and Joe Root. The clash of these cricketing titans adds a layer of excitement to every match.

monochrome photo of athletes on field
Photo by kabita Darlami on Pexels.com

Impact on the Cricketing World

The India vs. England rivalry doesn’t just captivate fans; it also has a significant impact on the cricketing world. These matches draw massive television audiences, making them a commercial success. They also inspire budding cricketers in both countries to dream of representing their nation on the grand stage.

The Build-Up and Hype

As the date of an India vs. England match approaches, the excitement and anticipation reach a fever pitch. Media coverage, expert analyses, and fan discussions dominate the cricketing landscape. The build-up to these matches is often as enthralling as the games themselves.

A Global Spectacle

What makes this rivalry even more remarkable is its global reach. Cricket enthusiasts from all corners of the world tune in to witness the battle between these giants. It’s a testament to the universal appeal of the sport and the charisma of these two cricketing nations.

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Photo by Aalekh Deval on Pexels.com

The Future of the Showdown

As we look to the future, the India vs. England cricket rivalry shows no signs of slowing down. With talented youngsters emerging on both sides, the battles are set to continue for years to come. The only certainty is that each encounter will be a spectacle to behold.

Conclusion

In the world of cricket, the clashes between India and England stand out as epic showdowns that encapsulate the spirit of the sport. The history, the players, the anticipation, and the impact make these matches a must-watch for cricket enthusiasts worldwide. As the rivalry continues to evolve, one thing is for sure: the epic showdown between India and England will remain a cornerstone of cricketing excellence for generations to come.

“वृद्ध व्यक्तियों के लिए वात रोग और उपाय”

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वृद्ध व्यक्तियों के लिए वात रोग

1.— वृद्ध व्यक्तियों के लिए वात रोग 60 वर्ष से अधिक होने की स्थिति में वात शरीर में प्रबल होता है। इन दिनों में वात की समस्याएं होना प्राकृतिक है। जो लोग 60 वर्ष या अधिक के हैं उनके लिए व्यायाम निषेध है। जैसे बच्चों को निषेध है। ऐसे लोगों को मालिश बहुत जरूरी है। जैसे बच्चों की वैसे ही वात वालों की। मालिश सर, तलवे और कान की ज्यादा करनी है। यदि व्यायाम करें तो बिल्कुल हल्का करें पसीने का नियम इन पर लागू नहीं होगा।

2.— वात के लोगों को आराम अधिक से अधिक करना चाहिए। पूजा- पाठ और भगवान की भक्ति ज्यादा से ज्यादा करनी चाहिए। वात के लोगों को भाग- दौड़ बहुत कम करनी चाहिए और दिशा निर्देश देने का कार्य ज्यादा करना चाहिए।

3.— मनुष्य मूत्र भी औषधि के रूप में काम आता है। यानी औषधि रूप में कोई भी अपना स्वमूत्र पी सकता है। स्वमूत्र तभी और वही लोग पी सकते हैं जो लोग संपूर्ण रूप से शाकाहारी हैं। मांस, मदिरा, अंडा आदि का सेवन नहीं करते हों। गौमूत्र हमेशा मनुष्य मूत्र से अच्छा है। सवेरे- सवेरे सोकर उठने के बाद का पहला मंत्र उसमें भी शुरू का थोड़ा छोड़ें और आखिरी का थोड़ा छोड़ें यानी बीच का लेना है। स्वमूत्र 100 से 103 बीमारियों में काम आएगा। वात और कैफ की बीमारियों में बहुत काम आएगा पित्त की बीमारियों में थोड़ा काम आएगा।

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60 वर्ष से अधिक होने की स्थिति में वात शरीर में प्रबल होता है

वृद्ध व्यक्तियों के लिए वात रोग 60 वर्ष से अधिक होने की स्थिति में वात शरीर में प्रबल होता है। इन दिनों में वात की समस्याएं होना प्राकृतिक है। जो लोग 60 वर्ष या अधिक के हैं उनके लिए व्यायाम निषेध है। जैसे बच्चों को निषेध है। ऐसे लोगों को मालिश बहुत जरूरी है। जैसे बच्चों की वैसे ही वात वालों की। मालिश सर, तलवे और कान की ज्यादा करनी है। यदि व्यायाम करें तो बिल्कुल हल्का करें पसीने का नियम इन पर लागू नहीं होगा।

वात के लोगों को आराम अधिक से अधिक करना चाहिए। पूजा- पाठ और भगवान की भक्ति ज्यादा से ज्यादा करनी चाहिए। वात के लोगों को भाग- दौड़ बहुत कम करनी चाहिए और दिशा निर्देश देने का कार्य ज्यादा करना चाहिए।

मनुष्य मूत्र भी औषधि के रूप में काम आता है। यानी औषधि रूप में कोई भी अपना स्वमूत्र पी सकता है। स्वमूत्र तभी और वही लोग पी सकते हैं जो लोग संपूर्ण रूप से शाकाहारी हैं। मांस, मदिरा, अंडा आदि का सेवन नहीं करते हों। गौमूत्र हमेशा मनुष्य मूत्र से अच्छा है। सवेरे- सवेरे सोकर उठने के बाद का पहला मंत्र उसमें भी शुरू का थोड़ा छोड़ें और आखिरी का थोड़ा छोड़ें यानी बीच का लेना है। स्वमूत्र 100 से 103 बीमारियों में काम आएगा। वात और कैफ की बीमारियों में बहुत काम आएगा पित्त की बीमारियों में थोड़ा काम आएगा।

60 वर्ष से अधिक होने की स्थिति में वात शरीर में प्रबल होता है। इन दिनों में वात की समस्याएं होना प्राकृतिक है। जो लोग 60 वर्ष या अधिक के हैं उनके लिए व्यायाम निषेध है। जैसे बच्चों को निषेध है। ऐसे लोगों को मालिश बहुत जरूरी है। जैसे बच्चों की वैसे ही वात वालों की। मालिश सर, तलवे और कान की ज्यादा करनी है। यदि व्यायाम करें तो बिल्कुल हल्का करें पसीने का नियम इन पर लागू नहीं होगा।

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Photo by Şahin Sezer Dinçer on Pexels.com

वात के लोगों को आराम अधिक से अधिक करना चाहिए

वात के लोगों को आराम अधिक से अधिक करना चाहिए। पूजा- पाठ और भगवान की भक्ति वृद्ध व्यक्तियों के ज्यादा से ज्यादा करनी चाहिए। वात के लोगों को भाग- दौड़ बहुत कम करनी चाहिए और दिशा निर्देश देने का कार्य ज्यादा करना चाहिए।

मनुष्य मूत्र भी औषधि के रूप में काम आता है। यानी औषधि रूप में कोई भी अपना स्वमूत्र पी सकता है। स्वमूत्र तभी और वही लोग पी सकते हैं जो लोग संपूर्ण रूप से शाकाहारी हैं। मांस, मदिरा, अंडा आदि का सेवन नहीं करते हों। गौमूत्र हमेशा मनुष्य मूत्र से अच्छा है। सवेरे- सवेरे सोकर उठने के बाद का पहला मंत्र उसमें भी शुरू का थोड़ा छोड़ें और आखिरी का थोड़ा छोड़ें यानी बीच का लेना है। स्वमूत्र 100 से 103 बीमारियों में काम आएगा। वात और कैफ की बीमारियों में बहुत काम आएगा पित्त की बीमारियों में थोड़ा काम आएगा।

“पित्त प्राकृतिक और वात प्राकृतिक व्यक्तियों के लिए स्वास्थ्य सुझाव”

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man doing yoga
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(पित्त के प्रभाव वाले लोगों की दिनचर्या 14 वर्ष से 60 वर्ष तक)

1.–14 वर्ष से लेकर 60 वर्षों तक पूरा शरीर पित्त के प्रभाव में होता है। पित्त के लोगों का कफ कम हो जाता है और बात बहुत कम होता है। पित्त प्राकृति के लोगों की नींद 6 घंटे कम से कम और अधिक से अधिक 8 घंटे होनी चाहिए। ब्रह्म मुहूर्त में पित्त प्रकृति के लोगों का जगना बहुत आवश्यक है अथवा सुबह 4:00 बजे जाग जाएं।

अर्जुन के पेड़ की दातुन

2.–पित्त प्रकृति के लोगों को दांत कसाय अथवा कड़वी और तिक्त वाली वस्तुओं से साफ करना चाहिए अथवा नीम की दातुन करें। मदार, बाबुल, अर्जुन, आम, अमरूद आदि की दातुन करें। जनवरी से बरसात आने तक बरसात शुरू होने के बाद नहीं। इस समय में नीम की दातुन पित्त को संतुलित करेगी इस समय में नीम के अतिरिक्त मदार या बबूल की दातुन भी कर सकते हैं। बरसात के मौसम में आम की दातुन या अर्जुन के पेड़ की दातुन ठंडी के मौसम में अमरूद या जामुन की दातुन करें। पूरे साल भी नीम की दातुन कर सकते हैं लेकिन तीन-तीन महीने के बाद कुछ दिन छोड़कर और उन दिनों में गाय के गोबर की राख का दंत मंजन कर ले। दूसरा दंत मंजन किसी भी क्षेत्र की तासीर के हिसाब से तेल+ हल्दी+ नमक मिलाकर दांत साफ कर सकते हैं।

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गाय के गोबर का दंत मंजन

3.–गाय के गोबर की राख+ कपूर+ फिटकरी+ नमक मिलाकर, गाय के गोबर का दंत मंजन बना सकते हैं। दंत मंजन के लिए बारीक त्रिफला चूर्ण पीसें और थोड़ा सेंधा नमक मिलाकर करें। खाने के लिए त्रिफला चूर्ण थोड़ा मोटा पीसें। ऐसे ही 8 से 10 तरह के मंजन है और 12 तरह की दातुन है। सुबह-सुबह की लार पित्त को संतुलित करती है। अतः इसे दातुन करते समय पेट में जाने देना चाहिए। पेस्ट में सेक्रिन के रूप में चीनी होती है। चीनी और पित्त में बनती नहीं है। सुबह-सुबह मीठा (चीनी के रूप में यह सेक्रिन के रूप में) यदि मुंह में लगातार जाता है तो बहुत जल्दी दांत खराब होंगे।

4.–सभी पेस्ट मरे हुए जानवरों की हड्डियों से बन रहे हैं। कोलगेट मरे हुए शुगर की हड्डियों से और पेप्सोडेंट बन रहा है। मरे हुए गाय की हड्डियों से तथा क्लोजअप और फांरहंस बन रहे हैं बकरे और बकरियों की हड्डियों से।

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वित्त प्राकृति के लोगों को मालिश और व्यायाम दोनों करना चाहिए।

5.—त्रिफला चूर्ण का दत्त मंजन किसी भी ऋतु में किया जा सकता है। वित्त प्राकृति के लोगों को मालिश और व्यायाम दोनों करना चाहिए। बात के रोगियों के लिए मालिश पहले व्यायाम बाद में। पित्त की प्रधानता वाले व्यक्तियों के लिए व्यायाम पहले मालिश बाद में। शरीर में बगल में पसीना आने पर बयान बंद कर दें।

6.–भारत की जलवायु के हिसाब से यहां रोज सुबह-सुबह दौड़ना नहीं चाहिए। क्योंकि दौड़ते समय वात बहुत प्रबल होता है। भारत वात प्रकृति का देश है। यानी रुक्ष देश है जहां सुखी हवा चलती है। ऐसे व्यायाम जो धीरे-धीरे किए जाते हैं जैसे भारत की प्रकृति के हिसाब से सूर्य नमस्कार जो सबसे अच्छा है इसके अलावा छोटे छोटे स्तर के कोई भी व्यायाम जिसमें पसीना ना निकले। माताओं को व्यायाम की जरूरत नहीं है यदि वह रसोई घर के काम में लगी हैं। खास कर उनके लिए जो माताएं चक्की चलाती हैं या सिलबट्टे पर चटनी बनाती हैं।बहनों के लिए बहुत अच्छा व्यायाम है कमर से आगे की तरफ झुकना, जितना झुक पायें , उतनी ही झुकें।

7.–माताओं और बहनों के लिए भी मालिश जरूरी है। शरीर मालिश के साथ-साथ सिर की, कान की और तलवों की ज्यादा मालिश करनी है। मालिश के बाद स्नान करना है। स्नान उबटन आदि से करना है। इसके बाद भोजन तथा भोजन के बाद 20 मिनट का विश्राम या 10 मिनट वज्रासन। फिर दिन के कार्यकलाप उसके बाद शाम को 6:00 से 7:00 का भोजन, फिर 2 घंटे बाद सोना, पित्त वालों का इसी प्रकार का नियम है।

“स्वस्थ जीवन शैली के 10 महत्वपूर्ण तरीके”

स्वस्थ जीवन शैली के 10 महत्वपूर्ण तरीके

1. सूर्य उदय से ढाई घंटे तक जठराग्नि के काम करने का सबसे अच्छा समय है अर्थात सुबह 7:00 बजे से 9:30 बजे तक। हृदय के काम करने का सबसे अच्छा समय है ब्रह्म मुहूर्त से ढाई घंटे पहले अर्थात 2:00- 2:15 बजे से लेकर सुबह 4:00- 4:30 बजे तक हृदय सबसे ज्यादा सक्रिय होता है और सबसे ज्यादा ह्रदय घात इसी समय में आते हैं।

2. दोपहर का भोजन सुबह के भोजन का आधा होना चाहिए। शाम का भोजन दोपहर के भोजन का आधा होना चाहिए अर्थात यदि आप सुबह 6 रोटी खाते हैं तो दोपहर को चार रोटी ले लीजिए और शाम को दो रोटी ले लीजिए।

3. भोजन में मन की संतुष्टि पेट की संतुष्टि से ज्यादा बड़ी है। मन की संतुष्टि नहीं होने वाले भोजन करते रहने से 10 से 12 साल बाद मानसिक रोग पैदा होने लगते हैं अवसाद जैसी बीमारियां शरीर में प्रवेश करने लगती है। ऐसी स्थिति में कुल 27 तरह की बीमारियां हो सकती है।

4. मनुष्य को छोड़कर जीव जगत का हर प्राणी इस सूत्र का पालन करता है। -दोपहर के बाद जठराग्नि की तीव्रता कम होने लगती है लेकिन सूर्यास्त के समय जठराग्नि की तीव्रता बढ़ जाती है जैसे बुझते हुए दीपक की रोशनी उसके बुझते समय बढ़ जाती है। अतः रात्रि भोजन कभी न करें। सूरज डूबने से 40 मिनट पहले भोजन कर लेना चाहिए।

5. सूरज डूबने के बाद सिर्फ दूध पी सकते हैं जिसमें देसी गाय का दूध सबसे अच्छा है।

6. खाना हमेशा जमीन पर बैठकर ही खाए यानी सुखासन में खाना खायें। सुखासन में बैठकर खाते समय जांघों के नीचे की तरफ रख बहाव रुक जाता है। जिसके कारण सारा रक्त पेट में ही रहता है जो कि खाना पचाने में काफी मदद करता है। इस स्थिति में जठराग्नि सबसे ज्यादा तीव्र होती है। गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से नाभि चार्ज होती रहती है। कुर्सी पर बैठने से उसकी तीव्रता घट जाती है और खड़े हो जाने से उसकी तीव्रता बिल्कुल कम हो जाती है। शरीर के अंदर कई चक्र होते हैं जिनका असर जठराग्नि पर पड़ता है। खाना खाते समय खाना जमीन से थोड़ी ऊंचाई पर रखा होना चाहिए सुखासन के अतिरिक्त गाय का दूध निकालने की जो मुद्रा होती है उसमें भी खाना खा सकते हैं। ये मुद्रा शारीरिक श्रम अधिक करने वाले के लिए है अर्थात किसान अथवा मजदूरों के लिए है। सुखासन में बैठकर खाना खाने से पेट बाहर नहीं निकलता है।लेकिन डाइनिंग टेबल पर खाना खाने से पेट बाहर निकलता है डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर सुखासन में बैठकर खाना खायें हर एक जॉइंट्स में ल्यूब्रिकेंटस के लिए स्लोवियल फ्लू होता है। शरीर जितना अधिक पृथ्वी के नजदीक होगा अर्थात गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव में होगा उतना ही अधिक शरीर को लाभ होगा।

खाना हमेशा जमीन पर बैठकर ही खाए यानी सुखासन में खाना खायें

7. सुबह या दोपहर के खाने के तुरंत बाद कम से कम 20 मिनट की विश्रांति ले। विश्रांति वामकुक्षि अवस्था में लेकर लें अथवा भगवान विष्णु की शेषनाग पर लेटने की मुद्रा में लेटें। हमारे शरीर में तीन नाड़ियां है। सूर्य नाड़ी। चंद्र नाड़ी और मध्य नाड़ी। सूरज नाड़ी ही हमारे भोजन को पचाने में मदद करती हैं। (वाम कुक्षि) बाई तरफ करवट लेकर लेटते ही सूर्य नाड़ी शुरू हो जाती है। स्वस्थ व्यक्ति की अवस्था में खाना खाने की सूर्य नाड़ी सक्रिय हो जाती है। विश्रांति के दौरान नींद आने पर नींद को रोके नहीं। दोपहर का विश्राम 18 वर्ष से 60 वर्ष तक के लोगों के लिए 40 मिनट से 1 घंटे तक का होना चाहिए, 1 साल से 18 वर्ष और 60 वर्ष से अधिक के लोगों के लिए 1 घंटे से डेढ़ घंटे विश्राम करना चाहिए।

8. खाना पकाते समय शरीर के सभी अंगों से खून पेट की तरफ आता है जिसके कारण शरीर में आलस्य बढ़ता है। इसीलिए मस्तिष्क आराम करना चाहता है। इसके कारण नींद आती है।

9. दोपहर के खाने के बाद नींद लेने के महत्व पर पूरे विश्व में शोध हो रहे हैं जिसके परिणाम के तहत बहुत सारी कंपनियां अपने कर्मचारियों को दोपहर के भोजन के बाद नींद लेने का मौका देती है। जिस कर्मचारियों को नींद लेने की छूट दी गई है, उसके काम करने की क्षमता 3 गुना बढ़ गयी है। खाना खाने के बाद शरीर का रक्त दबाव बढ़ जाता है। इसलिए भी सुबह या दोपहर के खाने के बाद 20 से 40 मिनट का आराम करना ही चाहिए।

10. मनुष्य को छोड़कर जीव जगत का हर प्राणी इस सूत्र का पालन करता है।

“पित्त की बीमारियां और उसकी चिकित्सा “

शरीर के वेगों को कभी नहीं रोकना चाहिए जैसे नींद एक वेग है, इसे रोकना नहीं चाहिए क्योंकि वेगों को रोकने से भी बीमारियां उत्पन्न होती हैं।
पित्त की बीमारियां और उसकी चिकित्सा गर्मी के दिनों में पित्त धड़कता है, इसलिए ऐसा खाना चाहिए जो जल्दी हजम हो सके। बारिश के दिनों में पित्त सम रहता है। इसलिए बरसात के महीना में भोजन हल्का होना चाहिए। इस समय शरीर में पानी बहुत होता है। हरी पत्तियों की सब्जियों में पानी अधिक होता है। शरीर के लिए ज्यादा पानी भी अच्छा नहीं है और कम पानी भी अच्छा नहीं है।

आहार के अद्वितीय रूप

पित्त की बीमारियां और उसकी चिकित्सा गर्मी के दिनों में पित्त धड़कता है, इसलिए ऐसा खाना चाहिए जो जल्दी हजम हो सके। बारिश के दिनों में पित्त सम रहता है। इसलिए बरसात के महीना में भोजन हल्का होना चाहिए। इस समय शरीर में पानी बहुत होता है। हरी पत्तियों की सब्जियों में पानी अधिक होता है। शरीर के लिए ज्यादा पानी भी अच्छा नहीं है और कम पानी भी अच्छा नहीं है।

अजवाइन – पित्त का शत्रु

अजवाइन पित्त को संतुलित करने में महत्वपूर्ण है। पित्त की बीमारियां जैसे एसिडिटी, हाइपर एसिडिटी, अल्सर, मुंह में पानी आना, खाने का हजम न होना, खाना खाने के 2 से 3 घंटे बाद भी खाने का स्वाद मुंह में रहना, डकारें आना, हिचकी आना आदि को दूर करने में मदद करता है।

Bunch of parsley on a white background

धनिया, जीरा, अजवाइन – गैस का दुश्मन

धनिया, जीरा, और अजवाइन खाने से पेट की गैस खत्म हो सकती है। इन्हें खाने से सर्दियों में भी लाभ होता है।

Ghee or clarified butter in jar on wooden table .AI generative.
Ghee or clarified butter in jar on wooden table .AI generative.

घी – पित्त को संतुलित करने का रामबाण

पित्त को नियंत्रित करने के लिए सबसे अच्छा देसी गाय का घी होता है। इसे बरसात और गर्मी के समय में अधिक खाना चाहिए।

गैस की समस्या होने पर अजवाइन को खाने में शुरू करें या खाने के बाद थोड़ी अजवाइन तवे पर सेंक कर थोड़ा काला नमक मिलाकर जरूर खाएं, तीन दिन के अंदर गैस की समस्या से समाधान मिल सकता है।

Sprouts seed in white small bowl
Sprouts seed in white small bowl

रसोई में 108 चीजें – पित्त को संतुलित करने के लिए

पित्त की बीमारियां , पित्त को सम रखने के लिए अजवाइन के बाद कोई चीज यदि है तो वह है जीरा। काला जीरा, सफेद जीरा से अच्छा होता है। जीरे के बाद रिंग का नंबर आता है। हींग के पहाड़ होते हैं। इसके बाद धनिया का नंबर आता है। जब तक हरा धनिया है जब हरा धनिया खाएं। इसके बाद सूखा धनिया खाएं। दोनों के गुण बराबर होते हैं। पित्त को सम करने के लिए रसोई में कुल 108 चीजें हैं।

पित्त और बरसात के मौसम में आहार का ध्यान रखकर हम अपने स्वास्थ्य को संतुलित रख सकते हैं। इन आहारों को सही तरीके से सेवन करने से हम गर्मी और बरसात के मौसम में भी स्वस्थ रह सकते हैं।

पित्त को नियंत्रित करने के लिए सबसे अच्छा देसी गाय का घी होता है। इसे बरसात और गर्मी के समय में अधिक खाना चाहिए।

गैस की समस्या होने पर अजवाइन को खाने में शुरू करें या खाने के बाद थोड़ी अजवाइन तवे पर सेंक कर थोड़ा काला नमक मिलाकर जरूर खाएं, तीन दिन के अंदर गैस की समस्या से समाधान मिल सकता है।

पित्त की बीमारियां और उसकी चिकित्सा गर्मी के दिनों में पित्त धड़कता है, इसलिए ऐसा खाना चाहिए जो जल्दी हजम हो सके। बारिश के दिनों में पित्त सम रहता है। इसलिए बरसात के महीना में भोजन हल्का होना चाहिए। इस समय शरीर में पानी बहुत होता है। हरी पत्तियों की सब्जियों में पानी अधिक होता है। शरीर के लिए ज्यादा पानी भी अच्छा नहीं है और कम पानी भी अच्छा नहीं है।

अजवाइन पित्त को संतुलित करने में महत्वपूर्ण है। पित्त की बीमारियां जैसे एसिडिटी, हाइपर एसिडिटी, अल्सर, मुंह में पानी आना, खाने का हजम न होना, खाना खाने के 2 से 3 घंटे बाद भी खाने का स्वाद मुंह में रहना, डकारें आना, हिचकी आना आदि को दूर करने में मदद करता है।