“शरीर की सही व्यवस्था: धार्मिक और पारंपरिक आदतों का महत्व”

शरीर की सही व्यवस्था: धार्मिक और पारंपरिक

1. शरीर की व्यवस्था अथवा ढांचा इस प्रकार किया गया है जिसमें सोना, चलना और बैठना ही शरीर की सबसे अच्छी अवस्था है। अतः शरीर की व्यवस्था खाड़ा रहने के अनुकूल नहीं बनाई गई है। अतः दैनिक जीवन में कम से कम खड़ा रहना चाहिए। खड़ा रहने की स्थिति में गुरुत्वाकर्षण बल नाभि से ऊपर के हिस्से को प्रभावित करता है जिसे स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं माना गया है। चौपायों के शरीर की प्रकृति खड़े रहने की होती है।

2. चलते समय या खड़े रहते समय दोनों पैरों पर बराबर वजन होना चाहिए। चलते समय सबसे पहले एड़ी वाला भाग जमीन पर छूना चाहिए, उसके बाद तलवा छूना चाहिए, उसके बाद पंजा छूना चाहिए। ऊंचे हिल के जूते चप्पल कभी नहीं पहनना चाहिए।

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घर से निकलते समय सबसे पहले दाहिने पैर बाहर निकालें

3. घर से निकलते समय सबसे पहले दाहिने पैर बाहर निकालें अर्थात चौखट/दहलीज के बाहर सबसे पहले दाहिना पैर निकालना चाहिए किसी भी कार्यवश घर से बाहर जाते समय। मंदिर में प्रवेश करते समय सबसे पहले दाहिना पैर मंदिर के अंदर प्रवेश करना चाहिए। दाहिना कदम बाहर का मतलब आपकी सूर्यनाड़ी चलनी चाहिए। मंदिर में प्रवेश करते समय सूर्यनाड़ी चलनी चाहिए अर्थात जब भी किसी अच्छे कर्म, सत्कर्म या धर्म के कर्म से बाहर निकलें तो सूर्यनाड़ी सक्रिय होनी चाहिए और जब भी इसके विपरीत किसी मजबूरी में कोई कार्य करने निकलते हैं, कुसंग में निकलते हैं या किसी भी धर्म के कार्य पर निकलते हैं तो अपने पहले बाएं पैर दहलीज से बाहर निकालें और प्रवेश करें।

4. श्मशान घर से पहला कदम बांया ही पड़ना चाहिए। इसके अतिरिक्त शराब खाना, जुए का अड्डा, वैश्यालय ,पुलिस स्टेशन, न्यायालय आदि में बायें कदम से प्रवेश करें अर्थात जीवन में जिन चीजों को आप नहीं चाहते लेकिन मजबूरी में आपको करनी पड़ती है तो ऐसी स्थिति में बायें पैर से ही ऐसे स्थानों पर प्रवेश करें। जहां भी बुरे कर्म या कुकर्म होते हैं, वहां बायें कदम से ही प्रवेश करें।

5.शरीर की व्यवस्था अथवा ढांचा इस प्रकार किया गया है जिसमें सोना, चलना और बैठना ही शरीर की सबसे अच्छी अवस्था है। अतः शरीर की व्यवस्था खाड़ा रहने के अनुकूल नहीं बनाई गई है। अतः दैनिक जीवन में कम से कम खड़ा रहना चाहिए। खड़ा रहने की स्थिति में गुरुत्वाकर्षण बल नाभि से ऊपर के हिस्से को प्रभावित करता है जिसे स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं माना गया है। चौपायों के शरीर की प्रकृति खड़े रहने की होती है।

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ऊंचे हिल के जूते चप्पल कभी नहीं पहनना चाहिए।

6. चलते समय या खड़े रहते समय दोनों पैरों पर बराबर वजन होना चाहिए। चलते समय सबसे पहले एड़ी वाला भाग जमीन पर छूना चाहिए, उसके बाद तलवा छूना चाहिए, उसके बाद पंजा छूना चाहिए। ऊंचे हिल के जूते चप्पल कभी नहीं पहनना चाहिए।

7. घर से निकलते समय सबसे पहले दाहिने पैर बाहर निकालें अर्थात चौखट/दहलीज के बाहर सबसे पहले दाहिना पैर निकालना चाहिए किसी भी कार्यवश घर से बाहर जाते समय। मंदिर में प्रवेश करते समय सबसे पहले दाहिना पैर मंदिर के अंदर प्रवेश करना चाहिए। दाहिना कदम बाहर का मतलब आपकी सूर्यनाड़ी चलनी चाहिए। मंदिर में प्रवेश करते समय सूर्यनाड़ी चलनी चाहिए अर्थात जब भी किसी अच्छे कर्म, सत्कर्म या धर्म के कर्म से बाहर निकलें तो सूर्यनाड़ी सक्रिय होनी चाहिए और जब भी इसके विपरीत किसी मजबूरी में कोई कार्य करने निकलते हैं, कुसंग में निकलते हैं या किसी भी धर्म के कार्य पर निकलते हैं तो अपने पहले बाएं पैर दहलीज से बाहर निकालें और प्रवेश करें।

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श्मशान घर से पहला कदम बांया ही पड़ना चाहिए।

8. श्मशान घर से पहला कदम बांया ही पड़ना चाहिए। इसके अतिरिक्त शराब खाना, जुए का अड्डा, वैश्यालय ,पुलिस स्टेशन, न्यायालय आदि में बायें कदम से प्रवेश करें अर्थात जीवन में जिन चीजों को आप नहीं चाहते लेकिन मजबूरी में आपको करनी पड़ती है तो ऐसी स्थिति में बायें पैर से ही ऐसे स्थानों पर प्रवेश करें। जहां भी बुरे कर्म या कुकर्म होते हैं, वहां बायें कदम से ही प्रवेश करें।