“त्रिदोष: आयुर्वेद में रोगों के निदान और उपचार का गहरा ज्ञान” (वात, पित्त, कफ)

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त्रिदोष

त्रिदोष एक पूर्ण वैज्ञानिक सिद्धांत है जो आयुर्वेद की अद्भुत खोज है। इसके द्वारा रोग का निदान या उपचार के अतिरिक्त रोगी की प्रकृति समझने में सहायता मिलती है। त्रिदोष का मतलब होता है वात- पित्त- कफ। यदि त्रिदोष समावस्था में है तो शरीर स्वस्थ होगा और विषमावस्था में है तो अस्वस्थ होगा। वास्तव में वात, पित्त, कफ समावस्था में दोष नहीं होते बल्कि धातुएं होती है जो शरीर को धारण करती है और उसे स्वस्थ रखती हैं। जब ये धातुऐं दूषित या विषम होकर रोग पैदा करती हैं तो यह दोष कहलाता है।

रोग होने पर फिर से त्रिदोष का संतुलन आवश्यक है। साधारण व्यक्ति के लिए समझदारी इसी में हैं कि वह जितना संभव हो सके रोग से बचने का प्रयास करें। ना कि रोग होने के बाद डॉक्टर के पास इलाज के लिए भागे। कहा भी गया है इलाज से बचाव सदा ही उत्तम है। त्रिदोष के असंतुलन से बचने के लिए ऋतुचर्या, दिनचर्या, आहार-विहार का पालन आवश्यक है। आयुर्वेद में परहेज पालन के महत्व को आजकल आधुनिक डॉक्टर भी समझने लग गए हैं और अवश्यक परहेज पालन पर जोर देने लग गए हैं।

आयुर्वेद में रोगों के निदान

भारत के लोगों को 70 से 75 प्रतिशत रोग वात के है। 12 से 13 प्रतिशत रोग पित्त के हैं तथा 10 से 12% कफ के हैं। रोज हमारे शरीर में वात, पित्त और कफ की स्थिति स्थिर नहीं रहती है। सुबह वात अधिक होता है, दोपहर में पित्त हावी होता है और शाम को कफ की अधिकता होती है। यह पूरे 24 घंटे के क्रम की स्थिति है।

उपचार का गहरा ज्ञान

निरोग मतलब शरीर, मन और चित्त से स्वस्थ। ऐसा वात, पित्त, कफ तीनों के सम होने की स्थिति में ही संभव है। सम मतलब जितना बात चाहिए, जितना कफ चाहिए और जितना पित्त चाहिए इतना ही है। वात, पित्त और कफ शरीर के ऐसे दोष है जिसके बिना शरीर कम ही नहीं कर सकता है अर्थात जलवायु और मौसम के हिसाब से शरीर को जैसी आवश्यकता हो उसी क्रम में उनकी स्थिति शरीर में होनी चाहिए।

वात/ वायु का स्थान है कमर से अंगूठे (पर के) तक, पित्त का स्थान है कमर से छाती तक और कफ का स्थान है छाती से सिर तक। स्वस्थ रहने की दृष्टि से ये तीनों अपने अपने स्थान से हिलने नहीं चाहिए अर्थात सब अपने अपने क्षेत्र में रहने चाहिए और इसकी मात्रा में असमानता नहीं आनी चाहिए।

त्रिदोष

त्रिदोष एक पूर्ण वैज्ञानिक सिद्धांत है जो आयुर्वेद की अद्भुत खोज है। इसके द्वारा रोग का निदान या उपचार के अतिरिक्त रोगी की प्रकृति समझने में सहायता मिलती है। त्रिदोष का मतलब होता है वात- पित्त- कफ। यदि त्रिदोष समावस्था में है तो शरीर स्वस्थ होगा और विषमावस्था में है तो अस्वस्थ होगा। वास्तव में वात, पित्त, कफ समावस्था में दोष नहीं होते बल्कि धातुएं होती है जो शरीर को धारण करती है और उसे स्वस्थ रखती हैं। जब ये धातुऐं दूषित या विषम होकर रोग पैदा करती हैं तो यह दोष कहलाता है।

रोग होने पर फिर से त्रिदोष का संतुलन आवश्यक है। साधारण व्यक्ति के लिए समझदारी इसी में हैं कि वह जितना संभव हो सके रोग से बचने का प्रयास करें। ना कि रोग होने के बाद डॉक्टर के पास इलाज के लिए भागे। कहा भी गया है इलाज से बचाव सदा ही उत्तम है। त्रिदोष के असंतुलन से बचने के लिए ऋतुचर्या, दिनचर्या, आहार-विहार का पालन आवश्यक है। आयुर्वेद में परहेज पालन के महत्व को आजकल आधुनिक डॉक्टर भी समझने लग गए हैं और अवश्यक परहेज पालन पर जोर देने लग गए हैं।

आयुर्वेद में रोगों के निदान

भारत के लोगों को 70 से 75 प्रतिशत रोग वात के है। 12 से 13 प्रतिशत रोग पित्त के हैं तथा 10 से 12% कफ के हैं। रोज हमारे शरीर में वात, पित्त और कफ की स्थिति स्थिर नहीं रहती है। सुबह वात अधिक होता है, दोपहर में पित्त हावी होता है और शाम को कफ की अधिकता होती है। यह पूरे 24 घंटे के क्रम की स्थिति है।

उपचार का गहरा ज्ञान

निरोग मतलब शरीर, मन और चित्त से स्वस्थ। ऐसा वात, पित्त, कफ तीनों के सम होने की स्थिति में ही संभव है। सम मतलब जितना बात चाहिए, जितना कफ चाहिए और जितना पित्त चाहिए इतना ही है। वात, पित्त और कफ शरीर के ऐसे दोष है जिसके बिना शरीर कम ही नहीं कर सकता है अर्थात जलवायु और मौसम के हिसाब से शरीर को जैसी आवश्यकता हो उसी क्रम में उनकी स्थिति शरीर में होनी चाहिए।

वात/ वायु का स्थान है कमर से अंगूठे (पर के) तक, पित्त का स्थान है कमर से छाती तक और कफ का स्थान है छाती से सिर तक। स्वस्थ रहने की दृष्टि से ये तीनों अपने अपने स्थान से हिलने नहीं चाहिए अर्थात सब अपने अपने क्षेत्र में रहने चाहिए और इसकी मात्रा में असमानता नहीं आनी चाहिए।